Monday, January 16, 2017

कैसे हुआ ट्रैफिक सिग्नॅल का विकास


दोस्तो, ट्रैफिक सिग्नॅल के बिना हम सुरक्षित सडक यातायात की कल्पना ही नहीं कर सकते। वैसे, क्या आप यह जानते हैं कि आज सडक यातायात को सुचारू बनाने वाला ट्रैफिक सिग्नॅल की शुरुआत कैसे हुई? आइए जानें कि क्या है, ट्रैफिक सिग्नॅल के विकास की कहानी..
सबसे पहला प्रयोग
ट्रैफिक सिग्नॅल का सबसे पहला प्रयोग ब्रिटेन के हाउस ऑफ पार्लियामेंट में हुआ था। दरअसल, उस समय आज की तरह ट्रैफिक सिग्नॅल्स नहीं होते थे, बल्कि दो रंग (लाल, हरा) की लालटेन हुआ करती थीे, जिन्हें गैस से जलाया जाता था। इनका इस्तेमाल पार्लियामेंट के अस्तबल में घोडों की बडी संख्या को नियंत्रित करने के लिए किया जाता था। पार्लियामेंट में बडी संख्या में घोडों को रखने की व्यवस्था थी। यहां इन घोडों की देखभाल की भी काफी अच्छी व्यवस्था थी। विभिन्न किस्म के घोडे अपने अलग-अलग स्थान पर रहें, ऐसी स्थिति में इनके मार्गदर्शन के लिए ये गैस लालटेन प्रयोग में लाए जाते थे। लैंप के रंग को देखने के बाद घोडे अपने-अपने स्थान को पहचान सकते थे। इससे ये दुर्घटना से भी बच जाते थे।
जब इस्तेमाल रोकना पडा
गौरतलब है कि आगे जाकर उक्त गैस लालटेन का इस्तेमाल ब्रिटेन के ट्रैफिक पुलिस ऑफिसर भी करने लगे थे। लेकिन एक दिन अचानक इस गैस लालटेन के कारण एक बडी दुर्घटना घट गई। इसके परिणामस्वरूप गैस से जलने वाली इन लालटेनों का प्रयोग बीच में ही बंद कर देना पडा। हालांकि कुछ अन्य माध्यमों से कहीं-कहीं ट्रैफिक सिग्नॅल का इस्तेमाल भी चलता रहा।
पहला व्यवस्थित इस्तेमाल
बात सन 1920 की है। यह वह समय था, जब सडकों पर ट्रैफिक की समस्या धीरे-धीरे बढने लगी। इस दौरान अमेरिका की ट्रैफिक पुलिस ने ट्रैफिक यातायात व्यवस्था को ठीक करने के लिए ट्रैफिक सिग्नॅल्स का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया।
दरअसल, पहली बार तभी दुनिया में ट्रैफिक सिग्नॅल का व्यवस्थित इस्तेमाल किया गया था।
किसने की ठोस पहल?
20 नवंबर,1923 को गैरट ऑगस्टस मॉर्गन नामक एक अमेरिकी बिजनेसमैन ने आधुनिक ट्रैफिक सिग्नॅल के निर्माण की दिशा में एक ठोस पहल की। दरअसल, उन्होंने आधुनिक ट्रैफिक संकेत-पद्धति से मिलते-जुलते एक यंत्र का निर्माण किया। कुल मिलाकर देखें, तो मॉर्गन की इसी टेक्नोलॉजी को आधुनिक टै्रफिक सिग्नॅल सिस्टम का आधार माना गया।
मॉर्गन का ट्रैफिक सिग्नॅल अंग्रेजी के टी-अक्षर के आकार पर आधारित था, जिसमें तीन संकेतों का उल्लेख था। पहला, रुको(स्टॉप), दूसरा, जाओ(गो) और तीसरा संकेत सभी दिशा में जाने से संबंधित थे। दरअसल, तीसरा संकेत पैदल यात्रियों से संबंधित था। काफी समय तक मॉर्गन के ट्रैफिक मैनेजमेंट संकेतों को ही पूरे उत्तरी अमेरिका में इस्तेमाल किया गया, लेकिन बाद में इन तीनों संकेतों को तीन रंगों (लाल, हरा और पीला) से जोड दिया गया।
मॉडर्न ट्रैफिक सिग्नॅल
साल-दर-साल ट्रैफिक सिग्नॅल सिस्टम में विकास होता रहा और धीरे-धीरे यह आज के मॉडर्न स्वरूप तक पहुंच गया। आज इसका इस्तेमाल पूरी दुनिया में होता है। वैसे, आजकल इलेक्ट्रॉनिक ट्रैफिक सिग्नॅल का इस्तेमाल किया जाने लगा है। इसमें बारीक इलेक्ट्रॉनिक लाइट्स से बनी आकृतियां होती हैं और इन आकृतियों के माध्यम से भी सडक पर लोगों को ट्रैफिक संकेत मिलते हैं। अधिकांश मेट्रो सिटीज में तो अब कैमरे वाले ट्रैफिक सिग्नॅल भी लग गए हैं।
दरअसल, कैमरे वाली ट्रैफिक लाइट में कैमरे को ट्रैफिक सिग्नॅल की लाल रंग की लाइट में लगाया जाता है। इस तरह की ट्रैफिक सिग्नॅल की खासियत यह है कि अगर कोई ट्रैफिक सिग्नॅल की रेड लाइट को क्रॉस करने की गलती करता हैे, तो इस कैमरे की मदद से वह तुरंत पकड में आ जाता है।
तो मित्रो, है न दिलचस्प, ट्रैफिक लाइट के विकास की यह कहानी!

ये मन जितना वर्तमान से जुड़ेगा हम उतने शांत होंगे

ये मन जितना वर्तमान से जुड़ेगा हम उतने शांत होंगे - पं. विजयशंकर मेहता


जिन्हें शांति की खोज है उन्हें अपने भीतर की ऊर्जा को जानना होगा। हम ज्यादातर अपनी जीवन ऊर्जा का उपयोग कर ही नहीं पाते। इसका सबसे अच्छा उपयोग है इसका रूपांतरण करना। यह ऊर्जा अधिकांशत: मूलाधार चक्र पर पड़ी रहती है। इसे कल्पना के साथ सांस का प्रयोग करते हुए नीचे से ऊपर के चक्रों पर लाकर सहस्रार चक्र पर छोड़ना है। बिना किसी तनाव के तथा धर्य के साथ इसे अपनी दिनचर्या में जोड़ लें।

ऊर्जा जितने ऊपर के चक्रों पर है, हम उतने ही पवित्र रहेंगे और जितने पवित्र हैं उतने ही शांत होंगे। इसीलिए शांति की खोज बाहर न करके भीतर ही की जाए। पहले तो ऊर्जा को ऊपर उठाएं, दूसरा इसके अपव्यय को रोकें। ऊर्जा को बेकार खर्च होने से रोकने के लिए अच्छा तरीका है मंत्रजाप करें। व्यर्थ होती ऊर्जा सार्थक हो जाएगी। जब आप ऊर्जा के रूपांतरण में लगेंगे तो पहली बाधा भीतर से ही आएगी और यह कार्य करेगा हमारा मन। हम एक भूल और कर जाते हैं। इस मन को हम अपना समझ लेते हैं, जबकि इसका निर्माण हमारे लिए दूसरों ने किया है।

माता-पिता, मित्र, रिश्तेदार, शिक्षक आदि ने। जो हमारा बीता समय है, उसने हमारे मन को बनाया है। ये अतीत की स्मृतियां हमारे वर्तमान को आहत करती हैं, इसी कारण हमारा मन या तो अतीत से बंधा या भविष्य से जुड़ा रहेगा। मन जितना वर्तमान से जुड़ेगा, उतने ही हम शांत रहेंगे। इसी को जागरण कहा गया है। तो जाग्रत रहें और ऊर्जा को ऊपर उठाएं। फिर संसार की कोई भी परिस्थिति आपको अशांत नहीं कर सकती।

HIDDEN TRUTH OF TAJ MAHAL

















Tuesday, November 16, 2010

सोनिया का सच जान बेकाबू क्यों होते हो? - अनिल सौमित्र

सोनिया का सच जान बेकाबू क्यों होते हो? - अनिल सौमित्र

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एक बार फिर लोकतंत्र पर आपातकाल मंडरा पड़ा है. राजमाता सोनिया गांधी के सिपहसालारों ने कांग्रेसी गुण्डों, माफियाओं और लोकतंत्र के हत्यारों का आह्वान किया है कि वह देशभर में संघ कार्यालयों पर धावा बोल दे. इसका तत्काल प्रभाव हुआ और कांग्रेसी गुण्डों ने संघ के दिल्ली मुख्यालय पर धावा भी बोल दिया. ठीक वैसे ही जैसे इंदिरा गांधी की मौत के बाद सिखों को निशाना बनाया गया था. हिंसक और अलोकतातंत्रिक मानसिकता से ग्रस्त कांग्रेसी सोनिया का सच जानकर आखिर इस तरह बेकाबू क्यों हो रहे हैं?

10 नवम्बर को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने देशभर में अनेक स्थानों पर धरना दिया। संघ सूत्रों के अनुसार यह धरना लगभग 700 से अधिक स्थानों पर हुआ। इनमें लगभग 10 लाख से अधिक लोगों ने भाग लिया। हिन्दू विरोधी दुष्प्रचार की राजनीति के खिलाफ आयोजित इस धरने में संघ के छोट -बड़े सभी नेता-कार्यकताओं ने हिस्सा लिया। संघ प्रमुख मोहनराव भागवत लखनउ में तो संघ के पूर्व प्रमुख कुप्. सी. सुदर्शन भोपाल में धरने में बैठे। इसी धरने में मीडिया से बात करते हुए संघ के पूर्व प्रमुख ने यूपीए और कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी के बारे में कुछ बातें कही। इसमें मोटे तौर पर तीन बातें थी - पहली यह कि सोनिया गांधी एंटोनिया सोनिया माइनो हैं। दूसरी यह कि सोनिया के जन्म के समय उनके पिता जेल में थे और तीसरी बात यह कि उनका संबंध विदेशी खुफिया एजेंसी से है और राजीव और इंदिरा की हत्या के बारे में जानती हैं।

गौरतलब है कि ये तीनों बातें पहली बार नहीं कही गई हैं। जनता पार्टी के नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी सार्वजनिक रूप से कई बार इन बातों को बोल चुके हैं। गौर करने लायक बात यह है कि हिन्दू आतंक, भगवा आतंक का नारा बुलंद करने वाले और संघ की तुलना करने वाले कांग्रेसी अपने नेता के बारे में कड़वी सच्चाई सुनकर बौखला क्यों गए? लोकतंत्र की दुहाई देने वाली पार्टी अपनी नेता के समर्थन में अलोकतांत्रिक क्यों हो गई? क्या कांग्रेस स्वभाव से ही फासिस्ट है?

कांग्रेस के नेता सुदर्शन के बयान की भाषा पर विरोध जता रहे हैं। लेकिन उनकी कही बातों पर नहीं। भाषा चाहे जैसी भी हो, लेकिन कांग्रेस को मालूम है कि उसके नहले पर संघ का दहला पड़ गया है। कांग्रेस के नेता ने भी तो संघ की तुलना आतंकी संगठन सिमी से की थी। उसी कांग्रेस के नेताओं ने भगवा आतंक और हिन्दू आतंकवादी कह कर संघ को लांछित किया था। यह जरूर है कि कांग्रेस के हाथ में केन्द्रीय सत्ता की बागडोर है।


संघ के हाथ में ऐसी कोई सत्ता नहीं है। कांग्रेस के बड़े नेता और केन्द्र सरकार में कांग्रेस के मंत्री चाहे तो तो जांच एजेंसियों और पुलिस को इशारा कर सकते हैं। उनके एक इशारे पर जांच की दिशा तय हो सकती है। आईबी, सीबीआई और अब एटीएस को ऐसे इशारे कांग्रेसी नेता-मंत्री करते रहे हैं। जैसे गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने पुलिस प्रमुखों की बैठक में भगवा आतंक का सिद्धांत गढ़ने की कोशिश की, जैसे दिग्विजय सिंह ने पत्रकारों से चर्चा में संघ पर आईएसआई से पैसा लेने का आरोप लगा दिया, जैसे किसी लेखक ने पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी पर सीआईए से पैसा लेने का उल्लेख किया ठीक वैसे ही सुदर्शन ने कांग्रेस प्रमुख सोनिया के बारे में कुछ रहस्योद्घाटन कर दिया। कांग्रेस सड़कों पर क्यों उतर रही है? क्यों नहीं सुदर्शन के रहस्योद्घाटन की जांच करवा लेती? देश के सामने सोनिया का सच आना ही चाहिए। अगर सुदर्शन झूठे होंगे तो वे या फिर सोनिया बेनकाब हो जायेंगी। लेकिन कांग्रेस माता सोनिया के खिलाफ कांग्रेसी कुछ सुन नहीं सकते, कुछ भी नहीं।


जाने-अंजाने ही सही, असामयिक ही सही लेकिन सुदर्शन ने कांग्रेस की दुखती रग पर चिकोटी काट ली है। सघ भले ही आहत हिन्दुओं को लामबंद करने, अयोध्या, कश्मीर और कांग्रेसी आदर्श भ्रष्टाचार के आगे ‘सोनिया के सच’ को नजरअंदाज कर दे, लेकिन आज नहीं तो कल उसे ही घांदी, नेहरू, माइनो और ‘बियेन्का-रॉल’ परिवार के सच को सामने तो रखना ही होगा। देश के पूर्व प्रधानमंत्री, भावी प्रधानमंत्री और श्यूडो प्रधानमंत्री के परिवार-खानदान के बारे में जानने-समझने का हक हर भारतीय का है। राजीव गांधी के नाना-नानी के साथ उनके दादा-दादी के बारे में देश को मालूम होना चाहिए। देश अपने जैसे भावी प्रधानमंत्री राहुल-प्रियंका (बियेन्का-रॉल) के दादा-दादी की तरह उनके नाना-नानी के बारे में भी कैसे अंजान रह सकता है। आखिर इस परिवार-खानदान, नाते-रिश्तेदारे के धर्म-पंथ बार-बार बदलते क्यों रहे हैं?


कांग्रेस आदर्श घोटाले, कॉमनवेल्थ घोटाले, स्पेक्ट्रम घोटाले, कश्मीर, अयोध्या, नक्सलवाद और हिन्दू-भगवा आतंक के सवाल पर बुरी तरह घिर चुकी है। कर्नाटक में उसका खेल बिगड़ चुका है। बिहार चुनाव में उसकी हालत बिगड़ने वाली है। ऐसे में संघ का देशव्यापी आन्दोलन और जन-जागरण्, कांग्रेस के नाक में दम करने वाला है। संघ काफी समय बाद सड़कों पर आया है। कांग्रेस का घबराना स्वाभाविक है। कांग्रेसियों को सड़कों पर लाने और संघ के मुद्दे को दिग्भ्रमित करने का इससे अच्छा मौका और कोई नहीं हो सकता। इसलिए सोनिया माता के अपनाम के नाम पर कांग्रेसियों को सड़कों पर उताने की तैयारी हो गई। इस तैयारी की भी संघ ने हवा निकाल दी। सुदर्शन के बयान को संघ की बजाए उनका व्यक्तिगत बयान कह कर संघ ने कांग्रेसी विरोध पर पानी फेर दिया।

हालांकि आज नही तो कल सोनिया गांधी के सवाल का जवाब तो कांग्रेस को ढूंढना ही होगा। कांग्रेस चाहे न चाहे उसे देश को यह बताना ही होगा कि सोनिया, एंटोनिया सोनिया माइनो है कि नहीं? वे एक बिल्डिंग कांट्रेक्टर स्टीफेनो माइनो की पुत्री है कि नहीं? माइनों एक रूढ़िवादी कैथोलिक परिवार से है कि नहीं? सोनिया के पिता इटली के फासिस्ट तानाशाह बेनिटो मुसोलिनी के प्रशंसक थे कि नही? क्या सोनिया पर अपने पिता का प्रभाव नहीं था? माइनों ने दूसरे विश्व युद्ध में रूसी मोर्चे पर नाजियों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। लेखक व स्तंभकार ए.सूर्यप्रकाश द्वारा संपादित पुस्तक ‘सोनिया का सच’ में यह उद्धृत है कि सन्1977 में, जब एक भारतीय पत्रकार जावेद लैक ने देखा कि श्री माइनो के ड्राइंगरूम में मुसोलिनी के सिद्धांतों का संग्रह था और उन्होंने अच्छे पुराने दिनों को याद किया। उन्होंने लैक को बताया कि नव-फासिस्टों को छोड़कर लोकतांत्रिक इटली में किसी अन्य राजनीतिक दल के लिए उनके मन में कोई सम्मान नहीं है। उन्होंने भारतीय पत्रकार को कहा कि ये सभी दल ‘देशद्राही’ हैं। कांग्रेस के नेताओं को यह भी बताना चाहिए कि क्या सोनिया माइनो का राजनैतिक संस्कार ऐसे ही वातावरण में नहीं हुआ था?

किसी कि भाषा, मर्यादा, संस्कृति, और शैली पर आक्षेप करने के साथ ही कांग्रेस को देश की जनता के सामने यह सच भी रखने का प्रयास करना चाहिए कि सोनिया माइनो ने राजीव गांधी से विवाह के पूरे पन्द्रह वर्ष बाद 7 अप्रैल, 1983 को भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन किया। आखिर भारतीय नागरिकता के प्रति वे इतने संशय में क्यों रही? कांग्रेस के नेता कांग्रेस माता के प्रति भले ही सिजदा करें, लेकिन वे देश को यह भी बतायें कि सोनिया अपने विवाह के पन्द्रह वर्ष तक अपनी इटालियन नागरिकता के साथ रही, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से वह भारत में मतदान का अधिकार प्राप्त करने के लिए उत्सुक थीं। वे जनवरी, 1980 में ही नई दिल्ली की मतदाता सूची में कैसे शामिल हो गई? जब किसी ने इस धोखाधड़ी को पकड़ लिया और मुख्य निर्वाचक अधिकारी को शिकायत कर दी तब 1982 में उनका नाम मतदाता सूची से निकाला गया। 1 जनवरी, 1983 को वे बिना भारतीय नागरिकता के ही भारत के मतदाता सूची में शामिल हो गई। किसी भी सभ्य, सुसंस्कृत, मर्यादित और कांग्रेसी शैली में कांग्रेस का कोई नेता यह सब देश के सामने क्यों नहीं रखता?


कांग्रेसी भले ही संघ-सुदर्शन का पुतला फूंके, लेकिन जिनके सामने वे सिजदा करते हैं उनके बारे में अपना ज्ञान जरूर दुरूस्त कर लें। संजय गांधी, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, माधवराव सिंधिया, राजेश पायलट सिर्फ कांग्रेस के ही नेता, बिल्क देश के भी नेता थे। एलटीटीई ने राजीव गांधी की हत्या की। दक्षिण की राजनेतिक पार्टियां एमडीएमके, पीएमके और डीएमके लिट्टे समर्थक रहे हैं, आज भी हैं लेकिन हत्यारों के समर्थकों के साथ कांग्रेस का कैसा संबंध है?

कांग्रेस जवाब दे, न दे देश तो सवाल पूछेगा ही कि जब इंदिरा को गोली लगी तो उनके साथ और कौन-कौन था, किसी एक को भी एक भी गोली क्यों नहीं लगी? घायल अवस्था में देश की प्रधानमंत्री इंदिराजी को पास के अस्पताल की बजाए इतना दूर क्यों ले जाया गया कि तब तक उनके प्राण-पखेरू ही उड़ गए? इन सब स्थितियों में महफूज और दिन-दूनी रात चैगुनी वृद्धि किसकी हुई, सिर्फ और सिर्फ सोनिया की! कौन भारतीय है जसे संदेश नहीं होगा! कांग्रेसी भी अगर अंधभक्ति छोड़ भारतीय बन देखें तो उन्हें भी सुदर्शन के सवालों में कुछ राज नजर आयेगा। वैसे भी सुदर्शन ने कुछ नया नहीं कहा है, बस जुबान अलग है बातें वहीं है जो कभी एस गुरूमूर्ति ने कही, कई बार सुब्रमण्यम स्वामी ने लिखा-कहा, पत्रकार कंचन गुप्ता ने लिखा। आज तक कांग्रेस ने किसी प्रकार के मानहानि का आरोप नहीं लगाया, कभी सड़कों पर नहीं उतरे। कांगेस कभी तो हंगामे की बजाए सवालों का जवाब दे।


Regards

Animesh Joshi
http://animeshjoshi.blogspot.com/
"Success is Never Permanent....Failure is never Final ....so stop never...give ur BEST and the forget the REST”

Saturday, February 27, 2010

हिन्दुओं में कोई पैगम्बर नहीं है

हिन्दुओं में कोई पैगम्बर नहीं है

ईसामसीह ईसाई धर्म के प्रवर्तक हैं । हजरत मुहम्मद इस्लाम के पैगम्बर माने जाते हैं । किन्तु हिन्दुत्व का न तो कोई प्रवर्तक है और न ही पैगम्बर । हिन्दुत्व एक उद्विकासी व्यवस्था है जिसमें विभिन्न मतों के सह-अस्तित्व पर बल दिया गया है । किसी को किसी एक पुस्तक में लिखी बातों पर ही विश्वास कर लेने के लिए विवश नहीं किया गया है । हिन्दू धर्म में फतवा जारी करने की कोई व्यवस्था नहीं है । यह उदारता और सहनशीलता पर आधारित धर्म है ।

हिन्दुओं में कोई पैगम्बर नहीं है

हिन्दुओं में कोई पैगम्बर नहीं है

ईसामसीह ईसाई धर्म के प्रवर्तक हैं । हजरत मुहम्मद इस्लाम के पैगम्बर माने जाते हैं । किन्तु हिन्दुत्व का न तो कोई प्रवर्तक है और न ही पैगम्बर । हिन्दुत्व एक उद्विकासी व्यवस्था है जिसमें विभिन्न मतों के सह-अस्तित्व पर बल दिया गया है । किसी को किसी एक पुस्तक में लिखी बातों पर ही विश्वास कर लेने के लिए विवश नहीं किया गया है । हिन्दू धर्म में फतवा जारी करने की कोई व्यवस्था नहीं है । यह उदारता और सहनशीलता पर आधारित धर्म है ।