जिन्हें शांति की खोज है उन्हें अपने भीतर की ऊर्जा को जानना होगा। हम ज्यादातर अपनी जीवन ऊर्जा का उपयोग कर ही नहीं पाते। इसका सबसे अच्छा उपयोग है इसका रूपांतरण करना। यह ऊर्जा अधिकांशत: मूलाधार चक्र पर पड़ी रहती है। इसे कल्पना के साथ सांस का प्रयोग करते हुए नीचे से ऊपर के चक्रों पर लाकर सहस्रार चक्र पर छोड़ना है। बिना किसी तनाव के तथा धर्य के साथ इसे अपनी दिनचर्या में जोड़ लें।
ऊर्जा जितने ऊपर के चक्रों पर है, हम उतने ही पवित्र रहेंगे और जितने पवित्र हैं उतने ही शांत होंगे। इसीलिए शांति की खोज बाहर न करके भीतर ही की जाए। पहले तो ऊर्जा को ऊपर उठाएं, दूसरा इसके अपव्यय को रोकें। ऊर्जा को बेकार खर्च होने से रोकने के लिए अच्छा तरीका है मंत्रजाप करें। व्यर्थ होती ऊर्जा सार्थक हो जाएगी। जब आप ऊर्जा के रूपांतरण में लगेंगे तो पहली बाधा भीतर से ही आएगी और यह कार्य करेगा हमारा मन। हम एक भूल और कर जाते हैं। इस मन को हम अपना समझ लेते हैं, जबकि इसका निर्माण हमारे लिए दूसरों ने किया है।
माता-पिता, मित्र, रिश्तेदार, शिक्षक आदि ने। जो हमारा बीता समय है, उसने हमारे मन को बनाया है। ये अतीत की स्मृतियां हमारे वर्तमान को आहत करती हैं, इसी कारण हमारा मन या तो अतीत से बंधा या भविष्य से जुड़ा रहेगा। मन जितना वर्तमान से जुड़ेगा, उतने ही हम शांत रहेंगे। इसी को जागरण कहा गया है। तो जाग्रत रहें और ऊर्जा को ऊपर उठाएं। फिर संसार की कोई भी परिस्थिति आपको अशांत नहीं कर सकती।
