Tuesday, November 16, 2010

सोनिया का सच जान बेकाबू क्यों होते हो? - अनिल सौमित्र

सोनिया का सच जान बेकाबू क्यों होते हो? - अनिल सौमित्र

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एक बार फिर लोकतंत्र पर आपातकाल मंडरा पड़ा है. राजमाता सोनिया गांधी के सिपहसालारों ने कांग्रेसी गुण्डों, माफियाओं और लोकतंत्र के हत्यारों का आह्वान किया है कि वह देशभर में संघ कार्यालयों पर धावा बोल दे. इसका तत्काल प्रभाव हुआ और कांग्रेसी गुण्डों ने संघ के दिल्ली मुख्यालय पर धावा भी बोल दिया. ठीक वैसे ही जैसे इंदिरा गांधी की मौत के बाद सिखों को निशाना बनाया गया था. हिंसक और अलोकतातंत्रिक मानसिकता से ग्रस्त कांग्रेसी सोनिया का सच जानकर आखिर इस तरह बेकाबू क्यों हो रहे हैं?

10 नवम्बर को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने देशभर में अनेक स्थानों पर धरना दिया। संघ सूत्रों के अनुसार यह धरना लगभग 700 से अधिक स्थानों पर हुआ। इनमें लगभग 10 लाख से अधिक लोगों ने भाग लिया। हिन्दू विरोधी दुष्प्रचार की राजनीति के खिलाफ आयोजित इस धरने में संघ के छोट -बड़े सभी नेता-कार्यकताओं ने हिस्सा लिया। संघ प्रमुख मोहनराव भागवत लखनउ में तो संघ के पूर्व प्रमुख कुप्. सी. सुदर्शन भोपाल में धरने में बैठे। इसी धरने में मीडिया से बात करते हुए संघ के पूर्व प्रमुख ने यूपीए और कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी के बारे में कुछ बातें कही। इसमें मोटे तौर पर तीन बातें थी - पहली यह कि सोनिया गांधी एंटोनिया सोनिया माइनो हैं। दूसरी यह कि सोनिया के जन्म के समय उनके पिता जेल में थे और तीसरी बात यह कि उनका संबंध विदेशी खुफिया एजेंसी से है और राजीव और इंदिरा की हत्या के बारे में जानती हैं।

गौरतलब है कि ये तीनों बातें पहली बार नहीं कही गई हैं। जनता पार्टी के नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी सार्वजनिक रूप से कई बार इन बातों को बोल चुके हैं। गौर करने लायक बात यह है कि हिन्दू आतंक, भगवा आतंक का नारा बुलंद करने वाले और संघ की तुलना करने वाले कांग्रेसी अपने नेता के बारे में कड़वी सच्चाई सुनकर बौखला क्यों गए? लोकतंत्र की दुहाई देने वाली पार्टी अपनी नेता के समर्थन में अलोकतांत्रिक क्यों हो गई? क्या कांग्रेस स्वभाव से ही फासिस्ट है?

कांग्रेस के नेता सुदर्शन के बयान की भाषा पर विरोध जता रहे हैं। लेकिन उनकी कही बातों पर नहीं। भाषा चाहे जैसी भी हो, लेकिन कांग्रेस को मालूम है कि उसके नहले पर संघ का दहला पड़ गया है। कांग्रेस के नेता ने भी तो संघ की तुलना आतंकी संगठन सिमी से की थी। उसी कांग्रेस के नेताओं ने भगवा आतंक और हिन्दू आतंकवादी कह कर संघ को लांछित किया था। यह जरूर है कि कांग्रेस के हाथ में केन्द्रीय सत्ता की बागडोर है।


संघ के हाथ में ऐसी कोई सत्ता नहीं है। कांग्रेस के बड़े नेता और केन्द्र सरकार में कांग्रेस के मंत्री चाहे तो तो जांच एजेंसियों और पुलिस को इशारा कर सकते हैं। उनके एक इशारे पर जांच की दिशा तय हो सकती है। आईबी, सीबीआई और अब एटीएस को ऐसे इशारे कांग्रेसी नेता-मंत्री करते रहे हैं। जैसे गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने पुलिस प्रमुखों की बैठक में भगवा आतंक का सिद्धांत गढ़ने की कोशिश की, जैसे दिग्विजय सिंह ने पत्रकारों से चर्चा में संघ पर आईएसआई से पैसा लेने का आरोप लगा दिया, जैसे किसी लेखक ने पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी पर सीआईए से पैसा लेने का उल्लेख किया ठीक वैसे ही सुदर्शन ने कांग्रेस प्रमुख सोनिया के बारे में कुछ रहस्योद्घाटन कर दिया। कांग्रेस सड़कों पर क्यों उतर रही है? क्यों नहीं सुदर्शन के रहस्योद्घाटन की जांच करवा लेती? देश के सामने सोनिया का सच आना ही चाहिए। अगर सुदर्शन झूठे होंगे तो वे या फिर सोनिया बेनकाब हो जायेंगी। लेकिन कांग्रेस माता सोनिया के खिलाफ कांग्रेसी कुछ सुन नहीं सकते, कुछ भी नहीं।


जाने-अंजाने ही सही, असामयिक ही सही लेकिन सुदर्शन ने कांग्रेस की दुखती रग पर चिकोटी काट ली है। सघ भले ही आहत हिन्दुओं को लामबंद करने, अयोध्या, कश्मीर और कांग्रेसी आदर्श भ्रष्टाचार के आगे ‘सोनिया के सच’ को नजरअंदाज कर दे, लेकिन आज नहीं तो कल उसे ही घांदी, नेहरू, माइनो और ‘बियेन्का-रॉल’ परिवार के सच को सामने तो रखना ही होगा। देश के पूर्व प्रधानमंत्री, भावी प्रधानमंत्री और श्यूडो प्रधानमंत्री के परिवार-खानदान के बारे में जानने-समझने का हक हर भारतीय का है। राजीव गांधी के नाना-नानी के साथ उनके दादा-दादी के बारे में देश को मालूम होना चाहिए। देश अपने जैसे भावी प्रधानमंत्री राहुल-प्रियंका (बियेन्का-रॉल) के दादा-दादी की तरह उनके नाना-नानी के बारे में भी कैसे अंजान रह सकता है। आखिर इस परिवार-खानदान, नाते-रिश्तेदारे के धर्म-पंथ बार-बार बदलते क्यों रहे हैं?


कांग्रेस आदर्श घोटाले, कॉमनवेल्थ घोटाले, स्पेक्ट्रम घोटाले, कश्मीर, अयोध्या, नक्सलवाद और हिन्दू-भगवा आतंक के सवाल पर बुरी तरह घिर चुकी है। कर्नाटक में उसका खेल बिगड़ चुका है। बिहार चुनाव में उसकी हालत बिगड़ने वाली है। ऐसे में संघ का देशव्यापी आन्दोलन और जन-जागरण्, कांग्रेस के नाक में दम करने वाला है। संघ काफी समय बाद सड़कों पर आया है। कांग्रेस का घबराना स्वाभाविक है। कांग्रेसियों को सड़कों पर लाने और संघ के मुद्दे को दिग्भ्रमित करने का इससे अच्छा मौका और कोई नहीं हो सकता। इसलिए सोनिया माता के अपनाम के नाम पर कांग्रेसियों को सड़कों पर उताने की तैयारी हो गई। इस तैयारी की भी संघ ने हवा निकाल दी। सुदर्शन के बयान को संघ की बजाए उनका व्यक्तिगत बयान कह कर संघ ने कांग्रेसी विरोध पर पानी फेर दिया।

हालांकि आज नही तो कल सोनिया गांधी के सवाल का जवाब तो कांग्रेस को ढूंढना ही होगा। कांग्रेस चाहे न चाहे उसे देश को यह बताना ही होगा कि सोनिया, एंटोनिया सोनिया माइनो है कि नहीं? वे एक बिल्डिंग कांट्रेक्टर स्टीफेनो माइनो की पुत्री है कि नहीं? माइनों एक रूढ़िवादी कैथोलिक परिवार से है कि नहीं? सोनिया के पिता इटली के फासिस्ट तानाशाह बेनिटो मुसोलिनी के प्रशंसक थे कि नही? क्या सोनिया पर अपने पिता का प्रभाव नहीं था? माइनों ने दूसरे विश्व युद्ध में रूसी मोर्चे पर नाजियों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। लेखक व स्तंभकार ए.सूर्यप्रकाश द्वारा संपादित पुस्तक ‘सोनिया का सच’ में यह उद्धृत है कि सन्1977 में, जब एक भारतीय पत्रकार जावेद लैक ने देखा कि श्री माइनो के ड्राइंगरूम में मुसोलिनी के सिद्धांतों का संग्रह था और उन्होंने अच्छे पुराने दिनों को याद किया। उन्होंने लैक को बताया कि नव-फासिस्टों को छोड़कर लोकतांत्रिक इटली में किसी अन्य राजनीतिक दल के लिए उनके मन में कोई सम्मान नहीं है। उन्होंने भारतीय पत्रकार को कहा कि ये सभी दल ‘देशद्राही’ हैं। कांग्रेस के नेताओं को यह भी बताना चाहिए कि क्या सोनिया माइनो का राजनैतिक संस्कार ऐसे ही वातावरण में नहीं हुआ था?

किसी कि भाषा, मर्यादा, संस्कृति, और शैली पर आक्षेप करने के साथ ही कांग्रेस को देश की जनता के सामने यह सच भी रखने का प्रयास करना चाहिए कि सोनिया माइनो ने राजीव गांधी से विवाह के पूरे पन्द्रह वर्ष बाद 7 अप्रैल, 1983 को भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन किया। आखिर भारतीय नागरिकता के प्रति वे इतने संशय में क्यों रही? कांग्रेस के नेता कांग्रेस माता के प्रति भले ही सिजदा करें, लेकिन वे देश को यह भी बतायें कि सोनिया अपने विवाह के पन्द्रह वर्ष तक अपनी इटालियन नागरिकता के साथ रही, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से वह भारत में मतदान का अधिकार प्राप्त करने के लिए उत्सुक थीं। वे जनवरी, 1980 में ही नई दिल्ली की मतदाता सूची में कैसे शामिल हो गई? जब किसी ने इस धोखाधड़ी को पकड़ लिया और मुख्य निर्वाचक अधिकारी को शिकायत कर दी तब 1982 में उनका नाम मतदाता सूची से निकाला गया। 1 जनवरी, 1983 को वे बिना भारतीय नागरिकता के ही भारत के मतदाता सूची में शामिल हो गई। किसी भी सभ्य, सुसंस्कृत, मर्यादित और कांग्रेसी शैली में कांग्रेस का कोई नेता यह सब देश के सामने क्यों नहीं रखता?


कांग्रेसी भले ही संघ-सुदर्शन का पुतला फूंके, लेकिन जिनके सामने वे सिजदा करते हैं उनके बारे में अपना ज्ञान जरूर दुरूस्त कर लें। संजय गांधी, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, माधवराव सिंधिया, राजेश पायलट सिर्फ कांग्रेस के ही नेता, बिल्क देश के भी नेता थे। एलटीटीई ने राजीव गांधी की हत्या की। दक्षिण की राजनेतिक पार्टियां एमडीएमके, पीएमके और डीएमके लिट्टे समर्थक रहे हैं, आज भी हैं लेकिन हत्यारों के समर्थकों के साथ कांग्रेस का कैसा संबंध है?

कांग्रेस जवाब दे, न दे देश तो सवाल पूछेगा ही कि जब इंदिरा को गोली लगी तो उनके साथ और कौन-कौन था, किसी एक को भी एक भी गोली क्यों नहीं लगी? घायल अवस्था में देश की प्रधानमंत्री इंदिराजी को पास के अस्पताल की बजाए इतना दूर क्यों ले जाया गया कि तब तक उनके प्राण-पखेरू ही उड़ गए? इन सब स्थितियों में महफूज और दिन-दूनी रात चैगुनी वृद्धि किसकी हुई, सिर्फ और सिर्फ सोनिया की! कौन भारतीय है जसे संदेश नहीं होगा! कांग्रेसी भी अगर अंधभक्ति छोड़ भारतीय बन देखें तो उन्हें भी सुदर्शन के सवालों में कुछ राज नजर आयेगा। वैसे भी सुदर्शन ने कुछ नया नहीं कहा है, बस जुबान अलग है बातें वहीं है जो कभी एस गुरूमूर्ति ने कही, कई बार सुब्रमण्यम स्वामी ने लिखा-कहा, पत्रकार कंचन गुप्ता ने लिखा। आज तक कांग्रेस ने किसी प्रकार के मानहानि का आरोप नहीं लगाया, कभी सड़कों पर नहीं उतरे। कांगेस कभी तो हंगामे की बजाए सवालों का जवाब दे।


Regards

Animesh Joshi
http://animeshjoshi.blogspot.com/
"Success is Never Permanent....Failure is never Final ....so stop never...give ur BEST and the forget the REST”

Saturday, February 27, 2010

हिन्दुओं में कोई पैगम्बर नहीं है

हिन्दुओं में कोई पैगम्बर नहीं है

ईसामसीह ईसाई धर्म के प्रवर्तक हैं । हजरत मुहम्मद इस्लाम के पैगम्बर माने जाते हैं । किन्तु हिन्दुत्व का न तो कोई प्रवर्तक है और न ही पैगम्बर । हिन्दुत्व एक उद्विकासी व्यवस्था है जिसमें विभिन्न मतों के सह-अस्तित्व पर बल दिया गया है । किसी को किसी एक पुस्तक में लिखी बातों पर ही विश्वास कर लेने के लिए विवश नहीं किया गया है । हिन्दू धर्म में फतवा जारी करने की कोई व्यवस्था नहीं है । यह उदारता और सहनशीलता पर आधारित धर्म है ।

हिन्दुओं में कोई पैगम्बर नहीं है

हिन्दुओं में कोई पैगम्बर नहीं है

ईसामसीह ईसाई धर्म के प्रवर्तक हैं । हजरत मुहम्मद इस्लाम के पैगम्बर माने जाते हैं । किन्तु हिन्दुत्व का न तो कोई प्रवर्तक है और न ही पैगम्बर । हिन्दुत्व एक उद्विकासी व्यवस्था है जिसमें विभिन्न मतों के सह-अस्तित्व पर बल दिया गया है । किसी को किसी एक पुस्तक में लिखी बातों पर ही विश्वास कर लेने के लिए विवश नहीं किया गया है । हिन्दू धर्म में फतवा जारी करने की कोई व्यवस्था नहीं है । यह उदारता और सहनशीलता पर आधारित धर्म है ।


हिन्‍दुत्‍व अथवा हिन्‍दू धर्म

हिन्‍दुत्‍व अथवा हिन्‍दू धर्म

हिन्दुत्व को प्राचीन काल में सनातन धर्म कहा जाता था। हिन्दुओं के धर्म के मूल तत्त्व सत्य, अहिंसा, दया, क्षमा, दान आदि हैं जिनका शाश्वत महत्त्व है। अन्य प्रमुख धर्मों के उदय के पूर्व इन सिद्धान्तों को प्रतिपादित कर दिया गया था। इस प्रकार हिन्दुत्व सनातन धर्म के रूप में सभी धर्मों का मूलाधार है क्योंकि सभी धर्म-सिद्धान्तों के सार्वभौम आध्यात्मिक सत्य के विभिन्न पहलुओं का इसमें पहले से ही समावेश कर लिया गया था। मान्य ज्ञान जिसे विज्ञान कहा जाता है प्रत्येक वस्तु या विचार का गहन मूल्यांकन कर रहा है और इस प्रक्रिया में अनेक विश्वास, मत, आस्था और सिद्धान्त धराशायी हो रहे हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आघातों से हिन्दुत्व को भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि इसके मौलिक सिद्धान्तों का तार्किक आधार तथा शाश्वत प्रभाव है।

आर्य समाज जैसे कुछ संगठनों ने हिन्दुत्व को आर्य धर्म कहा है और वे चाहते हैं कि हिन्दुओं को आर्य कहा जाय। वस्तुत: 'आर्य' शब्द किसी प्रजाति का द्योतक नहीं है। इसका अर्थ केवल श्रेष्ठ है और बौद्ध धर्म के चार आर्य सत्य की व्याख्या करते समय भी यही अर्थ ग्रहण किया गया है। इस प्रकार आर्य धर्म का अर्थ उदात्त अथवा श्रेष्ठ समाज का धर्म ही होता है। प्राचीन भारत को आर्यावर्त भी कहा जाता था जिसका तात्पर्य श्रेष्ठ जनों के निवास की भूमि था। वस्तुत: प्राचीन संस्कृत और पालि ग्रन्थों में हिन्दू नाम कहीं भी नहीं मिलता। यह माना जाता है कि परस्य (ईरान) देश के निवासी 'सिन्धु' नदी को 'हिन्दु' कहते थे क्योंकि वे 'स' का उच्चारण 'ह' करते थे। धीरे-धीरे वे सिन्धु पार के निवासियों को हिन्दू कहने लगे। भारत से बाहर 'हिन्दू' शब्द का उल्लेख 'अवेस्ता' में मिलता है। विनोबा जी के अनुसार हिन्दू का मुख्य लक्षण उसकी अहिंसा-प्रियता है

हिंसया दूयते चित्तं तेन हिन्दुरितीरित:।

एक अन्य श्लोक में कहा गया है

ॐकार मूलमंत्राढ्य: पुनर्जन्म दृढ़ाशय:

गोभक्तो भारतगुरु: हिन्दुर्हिंसनदूषक:।

ॐकार जिसका मूलमंत्र है, पुनर्जन्म में जिसकी दृढ़ आस्था है, भारत ने जिसका प्रवर्तन किया है, तथा हिंसा की जो निन्दा करता है, वह हिन्दू है।

चीनी यात्री हुएनसाग् के समय में हिन्दू शब्द प्रचलित था। यह माना जा सकता है कि हिन्दू' शब्द इन्दु' जो चन्द्रमा का पर्यायवाची है से बना है। चीन में भी इन्दु' को इन्तु' कहा जाता है। भारतीय ज्योतिष में चन्द्रमा को बहुत महत्त्व देते हैं। राशि का निर्धारण चन्द्रमा के आधार पर ही होता है। चन्द्रमास के आधार पर तिथियों और पर्वों की गणना होती है। अत: चीन के लोग भारतीयों को 'इन्तु' या 'हिन्दु' कहने लगे। मुस्लिम आक्रमण के पूर्व ही 'हिन्दू' शब्द के प्रचलित होने से यह स्पष्ट है कि यह नाम मुसलमानों की देन नहीं है।

भारत भूमि में अनेक ऋषि, सन्त और द्रष्टा उत्पन्न हुए हैं। उनके द्वारा प्रकट किये गये विचार जीवन के सभी पहलुओं पर प्रकाश डालते हैं। कभी उनके विचार एक दूसरे के पूरक होते हैं और कभी परस्पर विरोधी। हिन्दुत्व एक उद्विकासी व्यवस्था है जिसमें अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता रही है। इसे समझने के लिए हम किसी एक ऋषि या द्रष्टा अथवा किसी एक पुस्तक पर निर्भर नहीं रह सकते। यहाँ विचारों, दृष्टिकोणों और मार्गों में विविधता है किन्तु नदियों की गति की तरह इनमें निरन्तरता है तथा समुद्र में मिलने की उत्कण्ठा की तरह आनन्द और मोक्ष का परम लक्ष्य है।

हिन्दुत्व एक जीवन पद्धति अथवा जीवन दर्शन है जो धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को परम लक्ष्य मानकर व्यक्ति या समाज को नैतिक, भौतिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक उन्नति के अवसर प्रदान करता है। हिन्दू समाज किसी एक भगवान की पूजा नहीं करता, किसी एक मत का अनुयायी नहीं हैं, किसी एक व्यक्ति द्वारा प्रतिपादित या किसी एक पुस्तक में संकलित विचारों या मान्यताओं से बँधा हुआ नहीं है। वह किसी एक दार्शनिक विचारधारा को नहीं मानता, किसी एक प्रकार की मजहबी पूजा पद्धति या रीति-रिवाज को नहीं मानता। वह किसी मजहब या सम्प्रदाय की परम्पराओं की संतुष्टि नहीं करता है। आज हम जिस संस्कृति को हिन्दू संस्कृति के रूप में जानते हैं और जिसे भारतीय या भारतीय मूल के लोग सनातन धर्म या शाश्वत नियम कहते हैं वह उस मजहब से बड़ा सिद्धान्त है जिसे पश्चिम के लोग समझते हैं । कोई किसी भगवान में विश्वास करे या किसी ईश्वर में विश्वास नहीं करे फिर भी वह हिन्दू है। यह एक जीवन पद्धति है; यह मस्तिष्क की एक दशा है। हिन्दुत्व एक दर्शन है जो मनुष्य की भौतिक आवश्यकताओं के अतिरिक्त उसकी मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक आवश्यकता की भी पूर्ति करता है।

Thursday, December 17, 2009

ये मन जितना वर्तमान से जुड़ेगा हम उतने शांत होंगे

ये मन जितना वर्तमान से जुड़ेगा हम उतने शांत होंगे - पं. विजयशंकर मेहता

जिन्हें शांति की खोज है उन्हें अपने भीतर की ऊर्जा को जानना होगा। हम ज्यादातर अपनी जीवन ऊर्जा का उपयोग कर ही नहीं पाते। इसका सबसे अच्छा उपयोग है इसका रूपांतरण करना। यह ऊर्जा अधिकांशत: मूलाधार चक्र पर पड़ी रहती है। इसे कल्पना के साथ सांस का प्रयोग करते हुए नीचे से ऊपर के चक्रों पर लाकर सहस्रार चक्र पर छोड़ना है। बिना किसी तनाव के तथा धर्य के साथ इसे अपनी दिनचर्या में जोड़ लें।

ऊर्जा जितने ऊपर के चक्रों पर है, हम उतने ही पवित्र रहेंगे और जितने पवित्र हैं उतने ही शांत होंगे। इसीलिए शांति की खोज बाहर न करके भीतर ही की जाए। पहले तो ऊर्जा को ऊपर उठाएं, दूसरा इसके अपव्यय को रोकें। ऊर्जा को बेकार खर्च होने से रोकने के लिए अच्छा तरीका है मंत्रजाप करें। व्यर्थ होती ऊर्जा सार्थक हो जाएगी। जब आप ऊर्जा के रूपांतरण में लगेंगे तो पहली बाधा भीतर से ही आएगी और यह कार्य करेगा हमारा मन। हम एक भूल और कर जाते हैं। इस मन को हम अपना समझ लेते हैं, जबकि इसका निर्माण हमारे लिए दूसरों ने किया है।

माता-पिता, मित्र, रिश्तेदार, शिक्षक आदि ने। जो हमारा बीता समय है, उसने हमारे मन को बनाया है। ये अतीत की स्मृतियां हमारे वर्तमान को आहत करती हैं, इसी कारण हमारा मन या तो अतीत से बंधा या भविष्य से जुड़ा रहेगा। मन जितना वर्तमान से जुड़ेगा, उतने ही हम शांत रहेंगे। इसी को जागरण कहा गया है। तो जाग्रत रहें और ऊर्जा को ऊपर उठाएं। फिर संसार की कोई भी परिस्थिति आपको अशांत नहीं कर सकती।

Monday, October 26, 2009

Stages in career Development

Stages in career Development


A career is defined as a sequence of positions occupied by a person during the course of a lifetime.

The popular way of analyzing the career is to look at them as made up of stages. There are five stage models that is applicable to the most people during their work life.

Career stages model is the most popular way to view careers.

· Exploration is when individuals are exploring possible career options and making critical choices.

· Establishment begins with the search for work and getting that first job.

· Mid-career is when an individual is no longer seen as a "learner."

· Late career is when an individual can share his or her knowledge with others in the organization.

· Decline is when an individual leaves the work force.

Career stages:

Stage 1: Exploration

This stage includes a person’s earliest recollection of “what I want to be when I grow up” and the revisions on that dream as the person commits to his or her career work. This stage is usually heavily affected by spoken and unspoken messages that people receive from family or significant others regarding what their life path or journey should be. The messages are usually from a person’s elders about their desire for the type of work the person should do, where he or she should live, and spiritual dimensions and lifestyle such as choice of a partner, number of children, and so forth.

Many to the critical choices individual make about their carrier are made prior to every entering the work on a paid basis our parents relatives, teachers as well as what we see on television and films very early in our parents their interests, their aspirations and their financial resources will be heavy factors in determining out planets, their interests, their aspirations and their financial resources will be heavy factors in determine out perception of what carriers are available.

The exploration period ends for most in our mid-twenties as we get employed. From an organisation stand point. This stage has less relevance, since it occurs prior to employment. It is of course not irrelevant. The exploration period is when a number of expectations abt ones career are developed, many of which are unrealistic.

Stage 2: Establishment

The establishment period begins with the search for work and includes getting your first job being accepted by your peers, learning the job and gaining the first tangible evidence of success of or failure in the 'real world'.

It is a time that brings the uncertainties and anxieties. Additionally it also marked by the making of mistakes, learning from these mistakes and gradual assumption of increased responsibilities. However individuals in this stage have yet to reach their peak productivity and rarely are they given work assignment that carry great power or high stages.

At this stage, people bring with them a list of potential life and work options. The activities of this stage help people assess and understand their competency strengths; personality traits; abilities; interests; learning-style, work-style, and work-environment preferences; and personal, interpersonal, work, and cultural values. At this stage, people usually receive detailed information from having completed formal or informal appraisal instruments, checklists, simulations, interviews, and so forth. The output contains highly specific information about a person, including the effect of his or her value systems on personal preferences. People can use that appraisal information to revise the options they developed in the exploration stage.

Stage 3: Mid-Career

Most people do not face their first career dilemmas until they reach the mid-carrier stage this is a time where individual may continue their prior improvements in performance level off or begin to deteriorate. At this stage the first dilemma is accepting that on is no longer seen as a learner. Mistakes carry greater penalty. At this point in a career one is expected to have moved beyond apprenticeship to journeyman status. To those who make the successful transition go greater responsibilities and rewards. For others it may be a time of reassessment, job changes, adjustment of priorities or the pursuit of alternative life styles.

This is a delicate stage of career work because the outputs must be grounded in reality to the greatest degree possible. If they aren’t realistic, people are likely to experience frustration or disappointment later on. That could cause them to be discouraged, which could lead to abandoning any further effort. Thus, the decision-making process should result in a set of realistic career work goals, given the information available at the time.

Stage 4: Late Career

For those who continue to grow through the mid-carrier stage the late carrier usually is a pleasant time when one is allowed the luxury to relax a bit and enjoy playing the part of the elder state man. It is a time their one rest on one's laurels and both in the respect given by younger employees. During the late career days, individuals are no longer learning nor is it expected that they should out do their levels of performance from previous years. Their value to the organisation lies heavily in their judgment, built up over so many years and through varied experiences and sharing with and teaching others based on the knowledge they have gained.

For those who have stagnated or deteriorated during the previous stage the late career brings the reality that they will not have an everlasting impact or change the world as they had once thought. It is a time when individuals recognize that they have decreased work mobility and may be locked to their current job. One begins to look forward to retirement and the opportunities of doing something different life off the job is likely lot carry for greater importance then it did in earlier days.

Stage 5: Decline

The final stage in one's carrier is difficult for everyone but ironically is probably hardest on those who had continued successes in earlier stages. After several decades of continued achievements and high level of performance, time for retirement has reached. These individuals are forced to step out of the limelight and give up major component of their identity. For the most performers or those who have seen their performance deteriorate over the years. It may be pleasant time. The frustrations that have been associated with work will be left behind.

Adjustments of course will have to be made regardless of whether one is leaving a sparkling career or a dismal career. The regimentation that work provides will no longer be there. Responsibilities will be fewer in life and will be less structured. As a result it is a difficult stage for anyone to confront.